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June 16, 2024
स्वास्थ्य

मुहं के छालों से निजात पाने के लिए करें ये उपाय

  • August 4, 2017
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मुहं के छालों से निजात पाने के लिए करें ये उपाय

शरीर में गर्मी का प्रभाव ज्यादा होने पर अक्सर मुंह के भीतर, जीभ, होठों तथा भीतरी गालों पर छाले हो जाते हैं। इनसे रोगी को बहुत कष्ट उठाना पड़ता है। कई बार छालों का कष्ट इतना ज्यादा हो जाता है कि भोजन या पानी तक निगलना भी कष्टप्रद हो जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार उपवास तथा नाभि पर तेल लगाना ही छालों का सबसे उत्तम उपाय है। परन्तु ज्यादातर लोग इस प्राकृतिक उपाय पर विश्वास नहीं करते तथा बहुत जल्दी ही इनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। छालों से जल्दी राहत चाहने वाले धैर्य छोड़कर डॉक्टर के पास भागते हैं। परन्तु आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि केवल कुछेक प्रकार के छालों को छोड़कर शेष सभी छालों का उपचार शरीर खुद ही करता है।

ज्यादातर डॉक्टर छालों का कारण पेट की खराबी मानते हैं परन्तु होम्योपैथी में विष दोष को छालों का कारण माना जाता है। विभिन्न पाचक रस, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट आदि मिलकर लार का निर्माण करते हैं जो पाचक क्रिया को सक्रिय करती है। जब तक लार ठीक बनती रहती है तब तक पेट खराब होने की कोई वजह नहीं होती। किसी कारणवश यदि लार बनने में अनियमितता उत्पन्न हो जाए तो पेट खराब होने की स्थिति आ सकती है। छाले कई प्रकार के हो सकते हैं जैसे− प्रलीम− इस प्रकार के छालों में होठों के कोनों पर छाले हो जाते हैं तथा होठ भी कुछ मोटे हो जाते हैं। यह एक प्रकार का संक्रामक रोग है जिसकी अवधि 14 से 21 दिन हो सकती है। इसका मुख्य कारण सफाई न रखना तथा ऋतु के विरुद्ध भोजन की प्रवृत्ति है। इसका सबसे अच्छा उपचार सफाई है। सफाई रखने और स्वच्छ पेयजल के प्रयोग से अपनी अवधि के भीतर ही यह रोग स्वयं ठीक हो जाता है।
चिलाइटिस− यह रोग प्रायः निचले होठ पर होता है। इसमें एक छोटे बीज की तरह नुकीले छाले खड़े हो जाते हैं जिनमें बहुत कष्ट होता है। सोते समय इन छालों पर पपड़ी जम जाती है। इस प्रकार के छालों के कारणों के बारे में कुछ भी निश्चित तौर पर कहा नहीं जा सकता। 8−10 में ये छाले स्वयं ही ठीक हो जाते हैं।
फोर्डिस− ये सफेद अथवा पीले द्रव्य वाले छाले होते हैं जो होठों के ऊपरी तथा निचले हिस्से पर होते हैं। यह रोग केवल व्यस्कों को होता है। छालों की संख्या बढ़ते हुए होठों से आखिरी दाढ़ तक पहुंच जाती है। इस रोग की कोई चिकित्सा नहीं। लगभग सात दिनों में यह रोग स्वयं ठीक हो जाता है।
पलेक− इस रोग को ज्योग्राफिकल जीभ भी कहते हैं। इसमें जीभ के ऊपरी सिरे, मध्य भाग और किनारों पर सुई की नोंक के आकार के छोटे−छोटे छाले हो जाते हैं। ये लाल होते हैं कभी−कभी इनका आकार बढ़ कर आधा इंच तक लंबा हो सकता है। इन छालों में द्रव्य हो भी सकता है और नहीं भी। 10−15 दिन में ये छाले पहले जीभ के मध्य से तथा किनारों से स्वयं ही ठीक हो जाते हैं। पांच वर्ष तक के बच्चों में इसके होने की संभावना अधिक होती है ज्यों−ज्यों वे बड़े हो जाते हैं यह रोग खत्म होता जाता है। इसके भी कोई निश्चित कारण ज्ञात नहीं हैं।
फैरोड− इस प्रकार के छालों में जीभ पर गहरी पीली या सफेद मैल जम जाती है तथा जीभ के मध्य दरार जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस रोग में मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है और मुंह से बदबू भी आती है। भोजन का लंघन करने (उपवास करने) तथा नीम या बबूल की दातुन प्रयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
काली जीभ− इस प्रकार के छालों में जीभ का रंग काला−भूरा या पीला पड़ जाता है इस रोग में रोगी को ऐसी अनुभूति होती है मानो उसकी जीभ से कोई बाल चिपका हो और उसे किसी भी खाद्य−पदार्थ में कोई स्वाद नहीं आता। ज्यादा धूम्रपान करने तथा माउथ वाश का अत्याधिक प्रयोग करने से यह रोग होता है। यदि किसी व्यक्ति ने मर्करी संदूषित जल अथवा भोजन का प्रयोग कर लिया हो तो भी यह रोग हो जाता है। कुछ समय बाद यह रोग खुद ही ठीक हो जाता है।
ल्युकोपलाकिया− इस रोग में सफेद रंग के छाले जीभ पर मुंह की भीतरी सतह पर हो जाते हैं। इन छालों का विस्तार मसूढ़ों तक भी हो जाता है। कभी−कभी मुख के भीतरी हिस्से पर चकते भी हो जाते हैं। इस प्रकार के छालों का कोई आकार निश्चित नहीं होता, ये छोटे−बड़े कैसे भी हो सकते हैं। गुटखा, तम्बाकू तथा जर्दा खाने वाले लोगों तथा शराब का सेवन करने वालों में यह रोग ज्यादा होता है। सिफलिस रोग भी इस प्रकार के छालों का कारण हो सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रकार के छाले खुद−ब−खुद ठीक नहीं होते हैं इसकी चिकित्सा करवानी जरूरी है।
ज्यादातर छाले खुद ही ठीक हो जाते हैं। छालों से बचने का सबसे अच्छा तथा सरल उपाय है उचित आहार तथा पूरे शरीर के साथ−साथ मुंह के अंदर की सफाई। नहाने के बाद नाभि पर तेल लगाना भी फायदेमंद होता है।
खानपान में परहेज भी छालों से राहत दिलाता है। मिर्च−मसाले, चाय−काफी तथा तीक्ष्ण प्रकृति वाले खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए। कुछ खाद्य पदार्थों की प्रकृति विपरीत होती है इसलिए उनका प्रयोग साथ−साथ न करें, जैसे दही−तेल, दूध−मछली, तरबूज−पानी आदि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। हींग, कच्चा प्याज तथा लहसुन से परहेज करें। दही का प्रयोग छालों में भी विशेष लाभ देता है। धूम्रपान करने वालों को इस पर लगाम लगानी चाहिए। यदि छाले निश्चित अवधि में ठीक न हों तो डॉक्टर से परामर्श लें तथा साथ ही अपने आहार पर भी नियंत्रण रखें।