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June 16, 2024
छात्र एवं शिक्षा

‘छात्र राजनीति तय करेगी 2019 का चुनाव’ पढ़िए अकरम हुसैन क़ादरी का यह आलेख

  • October 15, 2017
  • 1 min read
‘छात्र राजनीति तय करेगी 2019 का चुनाव’ पढ़िए अकरम हुसैन क़ादरी का यह आलेख

2014 के लोकसभा चुनाव में आरएसएस की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जिस मजबूती से देश के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयो और कॉलेज स्तर पर अपनी पैठ बना रही थी उससे तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह छात्रशक्ति अपनी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी बीजेपी को कमसेकम 10 साल तक देश से उखड़ने नही देगी लेकिन 2017 में ही छात्रों का भरोसा वर्तमान सरकार की नीतियों से उठ गया है क्योंकि जबसे यह सरकार सत्ता में आई है तब से शिक्षा का बजट तो कम हुआ ही है उससे ज्यादा छात्रों पर दमनात्मक कार्यवाही भी बड़ी है और छात्र छात्राओं को मिलने वाले अनुदान में भी घटोत्तरी हुई है जिसकी वजह से उनकी छात्र इकाई कमज़ोर हुई है और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी बीजेपी को भी नुकसान हुआ है।

2014 के बाद देश के अनेक विश्वविद्यालयों में अजीब का मंज़र देखने को मिला सबसे पहले इसकी शुरुआत FTI से हुई जहां पर छात्रों ने गजेंद्र चौहान का विरोध किया है उसके बाद डॉ. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या फिर जेएनयू में फ़र्ज़ी देशद्रोह के मुक़दमे लगाए गए उसके बाद यूजीसी पर अपने फ़ेलोशिप के लिए लड़ाई लड़ रहे छात्रों पर दमनात्मक कार्यवाही हुई, जेएनयू छात्र नजीब को कुछ गुण्डो ने मार पीट की जो आज तक लापता है, रामजस कॉलेज में एक शहीद सैनिक की पुत्री के कुछ ट्वीट कर देने पर एबीवीपी के छात्रों ने उसको रेप करने की धमकी दी आखिर में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की छात्राओं पर कुछ शोहदों और असामाजिक तत्त्वों ने बत्तीमीज़ी की और उनके साथ विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी न्याय नही किया बल्कि उन छात्राओं को अपशब्द बोले गए जिससे छात्र राजनीति और ज्यादा गर्मा गयी और छात्र छात्राओ का विश्वास वर्तमान सरकार से कम हो गया।
अभी पिछले तीन चार महीने में हुई अनेक विश्वविधायलयो में छात्रसंघ चुनाव सबमे आरएसएस की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का सुफड़ा साफ हो गया ।

पिछले दिनों बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह ने 2019 में 350 सीट लाने का आंकड़ा पेश किया था कहीं ना कहीं यह प्रतीत हो रहा था कि यूपी चुनाव के बाद यह भविष्यवाणी सही साबित हो सकती है लेकिन जिस प्रकार से जाधवपुर यूनिवर्सिटी, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी, जेएनयू, अखिल विद्यार्थी परिषद का गढ़ कही जाने वाली दिल्ली यूनिवर्सिटी और आखिर में इलाहाबाद विश्वविद्यायल में भी सुफड़ा साफ हो गया, यह कही ना कहीं यह दर्शाता है कि बीजेपी, आरएसएस की पकड़ विश्वविद्यालयो में कमज़ोर हुई है जो निश्चित ही आगामी लोकसभा चुनाव में अपना रंग दिखाएगी उसके अलावा अनेक भावनात्मक मुद्दों पर जिस प्रकार से बीजेपी ने काम किया है उसको देश के पढ़े लिखे युवा तो समझ गए है यदि जनता भी समझ जाएं तो परिणाम एकदम अलग होंगे देश मे हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई की भाईचारे की बात होगी, हिन्दू मुस्लिम मुद्दा भी खत्म होने की कगार पर नज़र आ रहा है अब चुनाव विकास के मुद्दे पर होने की संभावना नज़र आ रही है

– लेखक अकरम हुसैन क़ादरी पत्रकारिता से जुड़े हैं |